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यह ज़ियारत इमाम अल-महदी (अ.त.फ़.श.) से संबंधित है और उनके चार विशेष प्रतिनिधियों में से एक के माध्यम से हम तक पहुँची है। इसे प्रमुख विद्वानों जैसे शेख अल-मुफीद और अल्लामा मजलिसी ने अपनी पुस्तकों में स्थान दिया है।

एक मोमिन के लिए जरूरी है कि वह कम से कम हर रोज़ एक बार इस ज़ियारत की तिलावत करे। यह हमें सिर्फ दुखी नहीं करती, बल्कि इमाम हुसैन (अ.स.) के रास्ते (अम्र बिल मारूफ और नही अनिल मुनकर) पर चलने की ताकत भी देती है।

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